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Monday, April 2, 2012

मुक्तक

 मैं मलबे से मकान बनाता हूँ
आदमी को इंसान बनाता हूँ .
अगर अपनी पर आ जाऊं तो -
पत्थर को भगवान बनाता हूँ .
   
रात को उजाले में लाता हूँ 
सुबह की रौशनी दिखाता हूँ 
आदमी को मसीहा बनाता हूँ 
अदृश हूँ कभी नजर नहीं आता हूँ .   

सौदा जरा सच्चा बेचता हूँ - 
फल थोडा कच्चा बेचता हूँ 
तेरी औकात क्या - हाकिम हूँ  
देश का बच्चा बच्चा बेचता हूँ

 दिल करे तो देश दुनिया जहान बेच दूं
जर्रा जर्रा - खेत खलिहान बेच दूं 
तेरी हस्ती ही क्या- राजनेता हूँ 
तेरा दीनईमान -तेरा भगवान बेच दूं .  

 थक गया हूँ फिर भी - थोडा टहल आऊँ 
दूर की उस कल्पना के संग थोडा दूर जाऊं 
चाहता है मन मैं कोई गीत गाऊं गुनगुनाऊं
शब्द बहरे हो गए - किसे गाकर सुनाऊं .

मैं अकेला ही चला था - यार 
मेरा अंदाज़ - ज़माने से थोडा जुदा था. 
कोई मंदिर ना मूरत -सच कहूं 
मैं अपना - खुद ही खुदा- नाखुदा था .

मेरे साथ ना जाने आजकल होता यही है 
कहता किसी को हूँ - और सुनता कोई है .

लिखने के अर्थ अलग होते हैं 
कहने के भावार्थ अलग होते हैं 
बिन लिखे कहे - समझ जाए कोई 
जहाँ में ऐसे हमदर्द कहाँ होते हैं .

मैं लिखूं - तो क्या तुम पढोगे 
या अपने शब्दार्थ खुद घडोगे.
सब तुम पर निर्भर है - अब
कविता बनोगे या कविता करोगे.

ये भव्य महल से - पूजाघर 
क्या रहता है भगवान इधर .
अंतर में झाँक अरे प्राणी - 
वो छिपा हुआ तेरे भीतर .

सोने के सिंघासन - ये रत्नजडित से कलश शिखर 
कैसे मानूं - ये भवन बने रहने को मेरे खुदा का घर . 
सिंदूर लगा पीपल नीचे - छत जिसकी है नीला अम्बर 
जो खुदा बसा मेरे अंदर ये भी तो है भगवान का दर .

कर्जा उतारता उसके मेरी ऐसी औकात कहाँ थी 
सूदखोर - महाजन नहीं यार वो तो मेरी माँ थी .

किसी तरह से इस दिल को बहलाएँगे 
वो नहीं आये -अब आज नहीं आयेंगे .


2 comments:

  1. बुधवारीय चर्चा मंच पर है
    आप की उत्कृष्ट प्रस्तुति ।

    charchamanch.blogspot.com

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  2. कितने में बेच रहे हैं
    ये भी तो बताइये
    कुछ छूट जरूर देते जाइये
    हो सके तो एक के साथ
    एक फ्री भी दिलवाइये।

    सुंदर !!!

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