Popular Posts

Sunday, March 10, 2013

क्षणिकाएं

खलिहान में बढे  क्या चार दाने और 
हाकिम ने खरीदे - हज़ार बारदाने और .


कोई मरता नहीं - किसी के साथ 
जीने वाले के साथ जिया जाता है .

जाना है तो चले जाओ - हमें क्या 
कोई करेगा इंतज़ार पर तुम्हें क्या .

यूँ तो बदली बरसती रही रात भर 
अपने हिस्से का इक कतरा निकला 
सूर्य की आवारगी तो जग जाहिर 
चाँद निकला भी तो बेपर्दा निकला

दिन हुआ - शाम हुई 
रात ढल गयी - कुछ 
इस तरह से जिन्दगी 
इक दिन और -
आगे निकल गयी . 

चलते चलते जिन्दगी तमाम हुई 
दिल कहता है सफ़र बाकी है मगर .

यात्रा थी जिन्दगी 
जो पूरी हुई 
दिनकी शाम तो हुई 
पर अधूरी हुई .

जीत ही जाती लहरें यार 
हौसला उनका कम नहीं था 
एक कमजोर सी कश्ती थी 
मगर तूफां में दम नहीं था .

बरसेंगी कब घटाएं - 
कब होगा भीगा सा सावन . 
इंतज़ार कब का बूढा हो चला 
आखिर कब आएगा - वो 
बिना तरस का एक बरस

कमाल का नाम है 
मौत तू - कैसी ग़ज़ल - 
कैसा कलाम है .
जो पढता है - वो 
सुनता नहीं -
जिसने सूना वो रहता नहीं 
बहूत सोचा यार - कह दूं 
वर्ना सच मान -  
मैं कहता नहीं .


हमारे बीच कुछ नहीं कामन 
बताओ यार निभेगी कैसे . 
खुद से अच्छा कोई नहीं लगता 
यार बन जाओ तुम मेरे जैसे .

जमीं से आसमान तक 
इस जहाँ से उस जहाँ तक 
न कोई हमसा मिलेगा - 
यार ढूँढोगे कहाँ तक .

मेरी आँखों में बस गया है कोई - 
या खुदा आँखों में कोई ख्वाब ना हो .
दिल कहता है लाजवाब हूँ मैं - लेकिन 
पूरे जहाँ में उनका भी कोई जवाब न हो .

वो रात गयी ये सुबह नयी 
होने दो अब कुछ बात नयी 
मायूसी को मत आने दो -
दिल जो चाहे हो जाने दो .

अंजाम जो भी हो - 
परवाह नहीं अब कोई 
जुबान जो कह ना सकी 
आँखों ने बात कह डाली .

निगाहें फेरने को दिल नहीं करता 
ये हटती ही नहीं उनके चेहरे से यार .

आज ज्यादा कुछ नहीं .
बस चंद शब्द कहने हैं .
मेरे भाव कहाँ जायेंगे 
आपके ही दिल में रहने हैं .
रात गहराने लगी अब यार -
कभी फुर्सत में गुनगुना लेना

लोग रुकते हैं चले जाते हैं 
ये मेरा दिल नहीं सराय है .

बढ़ गयी तो फिर कम नहीं होंगी 
बीच की दूरियां ख़तम नहीं होंगी .

बहारों के देश से आ गया है कोई 
दिल की चाहते जगा गया है कोई 
जिन्दगी फूल सी महकने लगी 
मेरे आँखों में समां गया है कोई .

ना कोई चाह ना जिद थी बिछुड़ जाने की 
ना जाने कैसे नज़र लग गयी जमाने की .

कोई जाकर उन्हें बताये - वो 
आये तो वो बहूत याद आये .

रस्मे-उल्फत जाने किस तरह निभाएंगे 
वो चले गए तो हमें बहूत याद आयेंगे .

चलते चलते जिन्दगी तमाम हुई 
दिल कहता है पर सफ़र बाकी है  .

जाना है तो चले जाओ - हमें क्या 
कोई करेगा इंतज़ार पर तुम्हें क्या .

दिन हुआ - शाम हुई 
रात ढल गयी - कुछ 
इस तरह से जिन्दगी 
आगे निकल गयी .

कोई घर से परेशां हैं - 
किसी को घर नहीं मिलता .
थका है कोई चल चलकर -
किसीको सफ़र नहीं मिलता .

वो वापिस लौट आये - जो गए थे चाँद पर यारो 
जमीं से सस्ता रहने को कहीं भी घर नहीं मिला .

किसी को चाह बसने की उसको घर नहीं मिला 
जिसे चलने की भूख थे - उसे सफ़र नहीं मिला . 
बहूत से लोग टकरा गए थे यार रस्ते में 
उम्र भर साथ देता वो हमसफ़र नहीं मिला .

कितनी हसींन नींद थी -कितने हसींन ख्वाब 
जाने किसी कमबख्त ने मुझको जगा दिया 
मुद्दत से बंद थी - मेरी ऑंखें फिर एक रोज़ 
चुंधिया गयी - किसने इसे सूरज दिखा दिया .

बहूत ढूंढा सपनों को ठिकाना नहीं मिला 
कहीं आसपास गुजरा ज़माना नहीं मिला .
मुर्दा मिले सब लोग - जब हम ढूँढने लगे 
जिन्दा सा कोई शख्स पुराना नहीं मिला .

सुबह होने की आस उनको है 
जिन्होंने रात को जिया ही नहीं .
हयात भी चाहिए सबसे पहले 
जहर जिसने कभी पीया ही नहीं .

भटकने से राह निकलेगी
उन्हें मिलेगी क्या जो 
घर से निकले ही नहीं .

बात जीने की ना हीं मरने की 
ना हरबार टूटकर बिखरने की .
हरेक टूट में जुडी इक नयी गाँठ - 
समेटूं तो डर है पोटली बिखरने की .

खुदा खुद हैरान की दुनिया को बनाए कैसे 
एक नारी बनायी  - और दुनिया बन गयी .

अटूट - बेजोड़ दीखता है वो भगवान् है 
जो टूट कर बार बार जुड़े - वो इंसान है .

तेरे आने से कुल शहर में बहार आई है 
हम गुलशन देखने ख्वामखां चले आये .

आदाब हर बार किया है मैंने 
नज़र उठने से पहले -
और नजर गिरने के बाद .

रात चाहे उदास है लेकिन 
किसी का इंतज़ार क्या करिए 
वो कोई भी सही फर्क कैसा यार 
पहलू में है बहार क्या करिए .

समा गयी महक बनके मेरे साँसों में 
मेरे वजूद से लिपटी हुई जो रहती है .
मुझसे यूँ दूर बहूत है लेकिन - जाने 
क्यों खुद को मेरी ग़ज़ल कहती है .

एक खुरदरा नंगा सा सच 
एक हसींन दिलकश सा झूठ 
ये झूठ - ना जाने क्यों यार 
मुझको सच से हसीं लगता है .

कहाँ उसका जहाँ कहाँ मेरा जहाँ 
कौन जाने वो कब चली आई यहाँ.
धीमी धीमी सी - महक आती है 
नहीं मालूम वो रहती है जाने कहाँ .

रात गहरानी थी - 
गहरा ही गयी . 
सपनों में आने की 
गुज़ारिश की किसी ने 
नींद को तो आना ही था 
आखिर आ ही गयी

मेरी खामोशियों को मेरी आँखों में एक बार पढो तो सही .
पत्थर हूँ बोलूँगा जरुर - पहले मुझे बुतसा गढ़ों तो सही .

रहम अब कौन करेगा हम पर 
जब हम खुद को खुदा कहते हैं .

अभी ना जाओ की रात अभी बाकी है 
मेरे उलझे हुए हालात अभी बाकी हैं 
उजालों में ना कह पाए कभी तुमसे 
बयां होने को जज्बात अभी बाकी हैं .

कुछ ख्याल बड़े जिद्दी अजीब होते हैं 
तब भी नहीं जाते जब वो करीब होते हैं .

कदम से कदम मिला - साथ साथ चले 
मिले कभी नहीं - रेल की पटरी की तरह .

निरापद थे तो क्या - कौशिश तो की चलने की 
रहगुज़र - मंजिल की तलाश कभी रही ही नहीं .









4 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  2. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

    ReplyDelete
  3. ,न कहते हुए बहुत कुछ कह गए .आप भी मेरे ब्लोग्स का अनुशरण करें ,ख़ुशी होगी
    latest postअहम् का गुलाम (भाग तीन )
    latest postमहाशिव रात्रि

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर क्षनिकाएं महोदय,
    साभार......

    ReplyDelete