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Tuesday, December 13, 2011

ये सिरफिरा चाँद - पागल है

ये सिरफिरा चाँद - पागल है
पर नहीं अनजान .
चन्द्रप्रभा के दुखों से - आखिर
क्यों नहीं परेशान .

सुन , तुझ से क्या -
कहती है चांदनी - जो 
बादल हवाओं में अटकती -
धरती पर आने को भटकती .
क्यों नहीं उतरने देती - इसे
ये प्रचंड सुर्यप्रभा - जमीन पर .

और तभी - सुबह के
अंदेशे में - लौट जाती है -फिर
वापिस चंद्रलोक को .  
ये क्रम अनंत काल से  - चल रहा है
रात हो रही है - दिन निकल रहा है .

1 comment:

  1. ये क्रम अनंत काल से - चल रहा है
    और चलता ही रहेगा... अनंतकाल तक !

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