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Tuesday, October 18, 2011

तू भी दे दे श्रधांजलि

तू भी दे दे श्रधांजलि -
ना सही प्यार -
आखिर दिवंगत से कौन
रखता है रार .

अंग्रेजों के बाद - नए माई-बाप
पुराने 'सर' नए लाटसाब
कभी तो मरने ही थे - दुःख कैसा
निश्चिन्त हो सो जा - नवजागरण
की वेला में कमसे कम
इस कदर मातम तो मत मना.

क्या हुआ जो अभी वेंटिलेटर
पर अंतिम घड़ियाँ गिन रहें हैं .
अमा यार वैसे तो मर चुके हैं
बस चमचे अंतिम यात्रा की
तैयारी कर रहें हैं .

देखना कितनी धूम से
निकलेगी -ये यात्रा
जमाना बड़ी- हैरत से देखेगा
ये जनाजा और - हमारी
दूसरी आज़ादी का जूनून .  
या जश्ने आज़ादी - जब नहीं
बचेगी इन बदनुमा जिस्मों पर
एक भी चिंदी - खादी.

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    मेरी बधाई स्वीकार करें ||

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  2. आपकी पोस्ट पर -
    यह मेरी ५० वी टिप्पणी ||
    आभार -
    जो यह अवसर मिला ||

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