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कभी कभी - खुद पे दया आती है और मैं निरीह सा हो जाता हूँ . सोचता हूँ तो - कहीं खो जाता हूँ . कभी अपना - और ना जाने किस किस का हो जाता ह...
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वो पौधा फल नहीं सकता जो अपनी जड़ से टुटा है मुबारक हो नहीं सकता जो अपने कल से छूटा है। लगेगी क्या कलम तेरी इन परदेसी मकानो...
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दिन दहाड़े - खुली आँख के सपने त्रिआयामी होते हैं - भले श्वेतशाम हों - ना सही रंगीन . जिनके टूटने का - मन में डर नहीं होता - सच तो ये है...
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