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प्रेम अनंत है - नफरत का - फिर भी अंत है . बहारें ही शाश्वत हैं पतझर की कल्पना बिलकुल - मनघडंत हैं . दुश्मनी सदा नहीं रहती मित...
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ये भगवान विष्णु क्षीर सागर में - शेष नाग की छतरी तले , कमल की शैया पर क्यों सोते हैं शेषनाग के दाँत तो बहुत विषैले होते है . ये कैसा व...
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कहीं कोई तो है इस बेमुरव्वत जहाँ में जो बरबस मुझे - याद करता तो है . थके क़दमों के सफ़र में - बेमन से ही सही साथ साथ गुजरता तो है - बे...
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वाह बहुत सुन्दर
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