जीना कोई जुर्म तो नहीं था -लेकिन
सारी उम्र कटी - गुनाहगारों की तरह .
हाथ दोनों में उनके - खंजर तीर थे
हम छिपे बैठे - थे शिकारों की तरह .
घरों के ख्वाब सजे थे -बाज़ारों में
वे शौक से निकले खरीदारों के तरह .
जो टूटे ख्वाबे- अदम में - तो जाना
नींद भी आई - पर रिश्तेदारों की तरह .
अभी मेरी किसी भी बात पर हैरान ना हो
जुते हैं बैल से - हम आज बेगारों की तरह .
कैसे आवाज़ दूं जो उनतक पहुंचे -यारो
घर बने हैं उनके ऊँची मीनारों की तरह .
जिन्दगी काश तुने हमसे पुछा तो होता
क्यों मिली हमको - यूँ बीमारों के तरह .
सारी उम्र कटी - गुनाहगारों की तरह .
हाथ दोनों में उनके - खंजर तीर थे
हम छिपे बैठे - थे शिकारों की तरह .
घरों के ख्वाब सजे थे -बाज़ारों में
वे शौक से निकले खरीदारों के तरह .
जो टूटे ख्वाबे- अदम में - तो जाना
नींद भी आई - पर रिश्तेदारों की तरह .
अभी मेरी किसी भी बात पर हैरान ना हो
जुते हैं बैल से - हम आज बेगारों की तरह .
कैसे आवाज़ दूं जो उनतक पहुंचे -यारो
घर बने हैं उनके ऊँची मीनारों की तरह .
जिन्दगी काश तुने हमसे पुछा तो होता
क्यों मिली हमको - यूँ बीमारों के तरह .