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Wednesday, October 5, 2011

आओ दशहरा मनाएं

दशाअवतार - नहीं
बस राम हों - और
हम राममय हो जाएँ .
चलो 'सर' करलें -
दस सर -दस दिशाएं
आओ दशहरा मनाएं .

आक्रान्ता के भाल पर
उस काल विकराल पर
नए लेख लिखें - पुराने मिटायें
आओ दशहरा मनाएं .

ना भूलें - नारायण -नर को
सहस्त्रा कवच के एक एक -कवच को
भेदें - तिमिर की स्याही को-  चलो 
अगणित सूर्य की रश्मियों से नहलाएं .
आओ दशहरा मनाएं .

बुझे हुए चाँद तारों को- बदल दें .
राख के ढेर में दबी - चिंगारियों को 
कोटि कोटि सूर्यों की मानिंद जगमगायें .
दीवाली बाद में फिर कभी - पहले
आओ दशहरा मनाएं .

Sunday, October 2, 2011

खुली आँख के सपने

दिन दहाड़े - खुली आँख के सपने
त्रिआयामी होते हैं - भले
श्वेतशाम हों - ना सही रंगीन .
जिनके टूटने का - मन में
डर नहीं होता - सच तो ये है की
रात का सपना - मर ही जाता है
कभी अमर नहीं होता .

दिन के उजाले-के सपने
सूर्य की मानिंद  - इनकी
चमक कभी फीकी नहीं होती - नहीं
कैद होते पलकों के घेरों में .
नहीं टूटते कभी नीम अंधेरों में .

ये कभी स्वयम स्फूर्त
कभी प्रयास से - और कभी
देवकृपा से सच हो जाते हैं .