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Monday, July 4, 2011

हमे फख्र है - हम गरीब हैं

हमे फख्र है - हम गरीब हैं
कोई चोर नहीं है यार .

मेरे कनस्तर में भले ही -
आटा नहीं मिलता है - पर
किसी स्विस बैंक में कोई
खाता भी नहीं चलता है .

दुनिया बदल जाती है - बारह बरस में
तो कुड़ी के ढेर के भी दिन बदलते हैं .
एक हम हैं - की वहीँ के वहीँ हैं
पता नहीं हमारे भाग्य किस दिशा में और -
कौन सी गति से चलते हैं .

कहने को बहूत हैं हम - आबादी का
एक तिहाई हिस्सा -पर कोई
कथा कहानी - नहीं बनती हमारी
जिन्दगी का कभी किस्सा .

वैसे देश है - नेता हैं , सरकार है
पर हमें क्या - हमारे लिए तो
सारे बिलकुल बेकार है.

अगर पत्ता भी हिलता है - तो
सारा वजूद कांपता है - नंगे
रहने की आदत है - हमारे
शरीर यहाँ कौन ढामपता है .

हमें ये क्या कपडे पहनाएंगे -
गर मांग भी लिए - तो
हम ही शर्मशार हो जायेंगे -
गाँधी की तरह ये खुद ही-
एक लंगोटी में सामने खड़े हो जायेंगे .

Friday, July 1, 2011

सत्य कहना और उसे

सत्य कहना और उसे -
उसी भाव से सहना - कहाँ है
इतना आसान - इस दुनिया में
निर्विकार भाव से रहना .
जब सच की खोज में-
इतने बूढ़े हो जाओगे -की
झूठ के कलेवर में छुपे - सत्य
को कैसे जान पाओगे .

मान ले मेरी बात - हट मत कर
बादल सूरज को कितनी देर तक
छुपायेगा - सुबह होगी - तो तू ही नहीं
सारा जग जान जाएगा .

फिर अपनी फैली बिसात से-
चाँद तारों में से - आखिर
किस किस को उठाएगा .
दिए का मान - क्या होता है
उस दिन तेरी समझ में खुद आ जाएगा.