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Thursday, August 25, 2011

आंधियां देश दुनिया घर नहीं देखती

आंधियां देश दुनिया घर नहीं देखती 
कोई पगडण्डी -सड़क शहर नहीं देखती 
जमीन से उठती हैं - और छा जाती हैं -
आसमान में या सारे जहान में .

किसी के घर आंगन - तक
आके लौट जाती हैं  
किसी महलनुमा घर के -खिडकियों 
दरवाजों तक की चूलें हिला जाती हैं. 

कभी कभी गलती से - किसी सही 
आदमी के इरादों में समां जाती हैं -
लौट कर - फिर कहीं नहीं जाती हैं .
और हर घडी यूँ ही तूफ़ान उठाती हैं .

कोई और बात करते हैं .

चलो इस अनशनी - अन्ना
को छोडो - यार
कोई और बात करते हैं .

जीने की बात बड़ी -फिजूल सी
लगती है -चलो
ना सही किसी और के लिए
अपने अपने लिए मरते हैं .

क़ुतुब मीनार - तो बंद है
कितना अच्छा ख्याल है - चलो
लाल किले की प्राचीर से -
कूद कूद कर आत्म हत्या करते हैं .

बड़ी प्यारी चीज होती है
जिन्दगी मेरे यार - चाहे
कितनी हो जाए किसी से रार.
मारने की तो सोचते हैं -
पर खुद कहाँ मरते हैं .

क्यों खटते हैं हम रात दिन -
इस पेट के कूए को भरने में -
जरा सोच फिर -क्या हर्ज है
अन्ना के संग अनशन करने में .