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Wednesday, August 1, 2012

एक रिश्ता - बड़ा अनाम

एक रिश्ता - बड़ा अनाम 
सोचता हूँ दूं - उसे 
कोई अच्छा सा नाम .

सावन सा उमड़ता - 
घुमड़ता रीझता हो . 
खिजाता हो - खीजता हो .

कोई ऐसी हो इस जहाँ में - 
ऐ दोस्त  
जिसका दिल मेरे दर्द से - 
बेतरह पसीजता हो .

जो लड़ सके दुनिया से -
मेरे एक मुस्कराहट के लिए 
पलकें बिछा दे मेरी एक
हलकी सी आहट के लिए .

बहूत सोचा - पर मिला नहीं
ऐसा कोई नाम - इस जहाँ में
जिसे दे सकूं - एक पवित्र 
रिश्ते - बंधन का नाम .

नजरें बार बार - दुनिया 
का चक्कर लगा - चकरा जाती हैं 
फिर फिर वापिस लौट के 
आ जाती हैं .

उसे ढूँढता रहा मैं बाहर
पर वो तो छिपी - हुई थी 
मेरे घर के भीतर ही - यार .

किसी से अब कुछ और - कहूं तो 
मेरी बहूत हेठी हो सकती है -
सोचता हूँ - वो सिर्फ और
सिर्फ - कोई और नहीं 
मेरी माँ की बेटी हो सकती है . 




Tuesday, July 31, 2012

अबकी जो बत्ती बुझी तो

अबकी जो बत्ती बुझी तो - 
जरुर सोनिया ने बुझाई होगी .
अन्ना का अनशन खतरे में -
शायद मनाने - जबरन खिलाने 
अँधेरे में कांग्रेस ही आई होगी . 

अमां यार छोड़ने पे पाबंदी तो नहीं
पर ऐसी छोडो - जो दिमाग में 
कहीं तो जाके अटके - भाई 
हमको तो समझ नहीं आये -
लोगों के ऐसे लटके - झटके .

हर मुसीबत - हर परेशानी में
ना जाने हम किस - किसका
लात - या हाथ ढूँढ़ते हैं .

बेचारा मनमोहन - लाचार 
बकरा बनता है हर बार .
अब हमेशा तो - ये बात 
हज़म नहीं होती 
छोडो - कुछ और 
ढंग का सा सोचो यार .